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खुशियाँ और दुख

मेरी खुशियाँ सिर्फ मेरी नहीं होती,

बिखरा देती हूँ उन्हें अपने इर्द गिर्द।

फिर जो भी आता मेरे दायरे में,,,

ये उसकी भी खुशियाँ हो जाती हैं |

भीग जाता,,, हो जाता सराबोर वो भी,

उस खुशी की महक से ।

वो भीनी भीनी खुश्बू खुशी की,

कर देती मजबूर उसे भी खुश हो जाने को।

खुश हो कर खुशियाँ लुटाने को 😊

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मेरे दुख सिर्फ मेरे अपने होते हैं

समेट लेती हूँ उन्हें अपने आँचल में।

छुपा लेती हूँ उन्हें पलकों के साये में

जो नमीं बन समाए रहते हैं पलकों तले

नहीं पड़ने देती किसी पर भी साया उन दुखों का,

कर देती हूँ दफन उन्हें दिल की गहराईयों में

ताकि न देख पाए कोई भी…

न जान जाए कोई उनकी हकीकत।

नहीं चाहती मैं,,,

कि कोई भी उदास हो

जो भी मेरे आसपास हो।

रहे सदा वो खुशहाली के साये में,

खुशियाँ पाए खुशियाँ लुटाए।

इस फूल की मानिंद,
उडा देती हूँ खुशी की महक चहूँओर |

सहेज लेती हूँ दुख रूपी काँटो को
अपने तन मन के इर्द-गिर्द |

इसी में मेरे नाम की सार्थकता है
इसी से मेरा संसार चहकता है ||

 

@ खुशी

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~~ बेटी की विदाई ~~

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चित्र गूगल से साभार

वो दिन जीवन में लाया खुशियाँ अनंत,
जब नन्ही सी बिटिया गोद में आई थी।

जन्नत मिल गई थी मानों मुझको जब,

अखियाँ मीचें इक कली मुस्काई थी।

हुई थोडी बडी तो घर भर दिया किलकारी से,
अपनी तुतलाती मीठी बोली से ढ़ेरों बातें बनाई थी।

परियों जैसी फ्रॅाक पहन वो कितनी इठलाई थी, 

खिलखिलाहट से फिर, घर-आँगन महकाई थी।

बीता बचपन नन्ही परी पर जवानी छाई थी,
हु बु हु दिखती वो मेरी ही तो परछाईं थी।

अब कठिन लम्हे आए जब करनी उसे पराई थी,
पत्थर दिल रहा होगा जिसने ये रीत बनाई थी।

थी जो माँ-बाप के कलेजे का टुकड़ा,
आज उसी की विदाई घड़ी आई थी।

धूमधाम से कर पाणिग्रहण संस्कार,
नम आँखों से देनी पड़ी विदाई थी।

बचपन से इस आँगन सींचा जिस पौध को,
आज फूल बन वो दूजे आँगन को महकाएगी।

दे ढ़ेरों दुआएँ शुभाशीष माँ-बाप ने उसे विदा किया,
इस घर-आँगन में अब उसकी यादें ही मुस्काई थी।

@ शशि शर्मा”खुशी”

 

–मन बंजारे–

चलता चल तु मन बंजारे,

बडी दूर है तेरी ठौर,

लम्बी डगर दूर का सफर,

छूट जाये ना जीवन-डोर,

है तु ऐसी राह का मुसाफिर

दिखे कहीं ना जिसका छोर

चलते जाने में जो सुख है

मिलेगा ना वो कहीं ओर

मिलेंगे राह में नये संगी

करेंगे तुझसे वो नित होड

कुछ दूर तो तेरे संग चलेंगे

बीच राह में फिर देंगे छोड

तु बस अनवरत चलते जाना

ले अपने अनुभवों का निचोड

मिल जायेगी मंजिल इक दिन

थम जायेगी सब भागम-दौड

खत्म होगा सफर जिस क्षण

होगी परम शांति चहूँ ओर

चलता चल तु मन बंजारे,

बडी दूर है तेरी ठौर

@ शशि शर्मा ‘खुशी’

-मैं पल दो पल का शायर हूँ की धुन पर गीत–

गीत लिखने का प्रथम प्रयास 😊
बताइएगा अवश्य कैसा लगा? कमियों का स्वागत है।
–मैं पल दो पल का शायर हूँ की धुन पर गीत–
___________________

मैं कलकल बहती सरिता हूँ
हरपल बहना मेरी रवानी है
सदियों से बहती ही जाती हूँ
युगों युगों में मेरी कहानी है

तुमसे पहले कितनी पीढ़ी
आई और आकर चली गई
कुछ पाप बहाकर चली गई
कुछ शीश नवांकर चली गई
वो भी एक पल का किस्सा थे
तुम भी एक पल का किस्सा हो
कल मुझसे जुदा हो जाओगे
जो आज इस पल का हिस्सा हो
मैं कलकल बहती सरिता हूँ
……… ….

मैं स्वर्ग से धरा पे आई थी
और शिव की जटा में समाई थी
धरती ने मुझको थाम लिया
तुम मनु ने माँ सा मान दिया
भागीरथ ने इतिहास रचा
तप के बल से वरदान लिया
तारा जब उसके कुल को
तो माँ गंगा मुझको नाम दिया
मैं कलकल बहती सरिता हूँ
……….. ….

कल और आएंगे वसुधा की
नई इबारत लिखने वाले
कुछ अपनी धुन में चलने वाले
कुछ होंगे बस सुनने वाले
कल कोई मुझको प्यार करे
या मेरे लिए तकरार करे
मुझको तो बहते जाना है
शीतलता मेरी उद्धार करे
मैं कलकल बहती सरिता हूँ

मैं कलकल बहती सरिता हूँ
हरपल बहना मेरी रवानी है
सदियों से बहती ही जाती हूँ
युगों युगों में मेरी कहानी है

@ शशि शर्मा”खुशी”
25/1/16

जीवन इक रंग-मंच

जीवन इक रंग-मंच है
जिसके हर परिप्रेक्ष्य में
हम नित्य नाटक रचते हैं
हमारा हर कार्य,भाव-भंगिमा
उसी नाटक का एक हिस्सा है
हम सभी अपने-अपने रोल
बखुबी अदा करते जाते हैं

सभी अपनी-अपनी जगह पर
मंजे हुए कलाकार हैं, और
अपनी कला का बखुबी प्रदर्शन
करते जाने का प्रयत्न करते हैं
फिर भी सभी अपने ही अंतर्मन
में एकदम खोखले और खाली-खाली हैं

बाहर चाहे कितने भी खुश
नजर क्यों ना आते हों
भीतर से सभी दुःखी
तन्हा-तन्हा और अकेले हैं
क्योंकि वे खुद को नही पहचानते
जो रोल वो इस संसार में निभा रहे हैं
उसी को स्वयम का स्वरूप समझ लेते हैं
स्वयं में व किरदार के भेद को
वो समझना ही नही चाहते
जिस दिन इस अंतर को
उन्होनें जान लिया समझो
स्वयम को पा गये,
अपनी पहचान पा गये

उसी दिन से वो ना केवल
अपने किरदार को बखुबी निभायेंगे
बल्कि अंतर्मन से भी खुश रहेंगे
पूर्ण होंगे, फिर कभी खुद को तन्हा

ना पायेंगे
यही जीवन है दोस्तो
यही है जीवन का सच
जिसने इसे जान लिया
उसने सब सुख पा लिया
जो नही जान पाया वो
सदैव तन्हा,उदास व दुखी रहा

@ शशि शर्मा “खुशी”

विषय : गौ माता

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गौ माता है पर उपकारी
कृष्ण को ये बेहद प्यारी
प्रभु का वरदान ये भारी
संतों ने भी आरती उतारी
दुग्ध, गौमुत्र हो या गोबर
सब हैं एक से एक बढकर
अमृत समान हैं चीजें सारी
गोबर खाद से खिलती क्यारी
खाती है बस घास चारा
देती पर दुध ढेर सारा
बछडा इसका बेहद प्यारा
उसके हिस्से का दूध भी वारा
अपने लिये कुछ न चाहती
हम पे अपना सर्वस्व लुटाती
निस्वार्थ भाव से देती जाती
फिर भी क्यों ये मारी जाती
रे! मनु, स्वार्थ को दे त्याग
अपने कर्त्तव्य से मत भाग
माँ सम सब तुझ पे लुटाती
फर्ज निभा तू बेटे की भाँति
गौ माता के दूध का कर्ज
उसे उतारना अब तेरा फर्ज
न देना कभी कोई दुख दर्द
दूर करना उसके हर मर्ज
ना खींची जाये कभी खाल
ना होने देना हाल बेहाल
दूध देना बंद हो तब भी
रखना तुम माँ का ख्याल
गोपाष्टमी को हम करते पूजा
माँ का हमारी ये रूप है दूजा
जिसने तुझ पे है जिंदगी वारी
न फिरे गलियों में वो मारी मारी
@ शशि शर्मा “खुशी”
19/01/16

 

पैसा

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इंसान ही इक ऐसा इकलौता जीव,
जो धरा पर रहने के दाम चुकाता है |
धरती माँ तो सब मुफ्त में लुटाती,
वो फिर उसकी कीमत है लगाता |
लगा कीमत खुद को विद्वान बताता,
कीमत अदा करने को पैसे कमाता |
पैसों से जमीन जायदाद जुटाता,
खाने पहनने को सामान ले आता |
फिर इक दिन इसी पैसे की खातिर,
भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता |
पैसा इंसान जरुरत के लिये बनाता,
वही इक दिन उस पर हावी हो जाता |
जो इक दिन सेवक था इंसान का,
वही इक दिन मालिक बन जाता |
पैसा इक दिन है सर चढकर बोलता,
हर रिश्ता तब इंसां पैसे से तौलता |
कुछ तो सोचो और बुद्धि लगाओ,
पैसे के ना तुम गुलाम बन जाओ |
जरुरत जितना तुम पैसा कमाओ,
इसके पीछे न स्वास्थ्य व रिश्ते गंवाओ |
@ शशि शर्मा “खुशी”
13/01/16