विषय : गौ माता

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गौ माता है पर उपकारी
कृष्ण को ये बेहद प्यारी
प्रभु का वरदान ये भारी
संतों ने भी आरती उतारी
दुग्ध, गौमुत्र हो या गोबर
सब हैं एक से एक बढकर
अमृत समान हैं चीजें सारी
गोबर खाद से खिलती क्यारी
खाती है बस घास चारा
देती पर दुध ढेर सारा
बछडा इसका बेहद प्यारा
उसके हिस्से का दूध भी वारा
अपने लिये कुछ न चाहती
हम पे अपना सर्वस्व लुटाती
निस्वार्थ भाव से देती जाती
फिर भी क्यों ये मारी जाती
रे! मनु, स्वार्थ को दे त्याग
अपने कर्त्तव्य से मत भाग
माँ सम सब तुझ पे लुटाती
फर्ज निभा तू बेटे की भाँति
गौ माता के दूध का कर्ज
उसे उतारना अब तेरा फर्ज
न देना कभी कोई दुख दर्द
दूर करना उसके हर मर्ज
ना खींची जाये कभी खाल
ना होने देना हाल बेहाल
दूध देना बंद हो तब भी
रखना तुम माँ का ख्याल
गोपाष्टमी को हम करते पूजा
माँ का हमारी ये रूप है दूजा
जिसने तुझ पे है जिंदगी वारी
न फिरे गलियों में वो मारी मारी
@ शशि शर्मा “खुशी”
19/01/16

 

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पैसा

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इंसान ही इक ऐसा इकलौता जीव,
जो धरा पर रहने के दाम चुकाता है |
धरती माँ तो सब मुफ्त में लुटाती,
वो फिर उसकी कीमत है लगाता |
लगा कीमत खुद को विद्वान बताता,
कीमत अदा करने को पैसे कमाता |
पैसों से जमीन जायदाद जुटाता,
खाने पहनने को सामान ले आता |
फिर इक दिन इसी पैसे की खातिर,
भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता |
पैसा इंसान जरुरत के लिये बनाता,
वही इक दिन उस पर हावी हो जाता |
जो इक दिन सेवक था इंसान का,
वही इक दिन मालिक बन जाता |
पैसा इक दिन है सर चढकर बोलता,
हर रिश्ता तब इंसां पैसे से तौलता |
कुछ तो सोचो और बुद्धि लगाओ,
पैसे के ना तुम गुलाम बन जाओ |
जरुरत जितना तुम पैसा कमाओ,
इसके पीछे न स्वास्थ्य व रिश्ते गंवाओ |
@ शशि शर्मा “खुशी”
13/01/16

–आप वही दे सकते हैं जो आपके पास है–

एक बार एक व्यक्ति ने एक नया मकान खरीदा..
उसमे फलों का बगीचा भी था..
मगर पडौस के मकान पुराने थे..और उनमे कई लोग रहते थे.
कुछ दिन बाद उसने देखा कि पडौस के मकान से किसी ने बाल्टी भर कूडा उसके घर दरवाजे पर डाल दिया है..
शाम को उस व्यक्ति ने एक बाल्टी ली उसमे ताजे फल रखे ..और उस घर के दरवाजे पर घंटी बजायी….
उस घर के लोग बेचैन हो गये.
और वो सोचने लगे कि वह उनसे सुबह की घटना के लिये लडने आया है..
अतः वे पहले ही तैयार हो गये और बुरा भला बोलने लगे..
मगर जैसे ही उन्होने दरवाजा खोला……वे हैरान हो गये…रसीले ताजे फलों की भरी बाल्टी के साथ…मुस्कान चेहरे पर लिये नया पडोसी सामने खडा था…
………सब हैरान थे……..

उसने कहा….जो मेरे पास था वही मैं आपके लिये ला सका…

सच है जिसके पास जो है वही वह दूसरे को दे सकता है…
जरा सोचिये…कि मेरे पास दूसरो के लिये क्या है….
………..

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प्यार बांटो प्यार मिलेगा,

खुशी बांटो खुशी मिलेगी…

इंतजार

रचा के मेहंदी पहन के कंगना,
आना है साजन मुझे तेरे अँगना।

पहन के कोट सजा के सेहरा,
ले के बारात तुम आना नैहरा।

जब से हुई तुम से कुड़माई,
नैनों में मेरे नींद ना आई।

देखूँ मैं हर पल ख्वाब सुनहरा,
प्रीत का असर हुआ है गहरा।

हर पल तेरी अब याद सताए,
तुझ बिन अब तो रहा न जाए।

बिंदिया पायल मेहंदी कंगना,
तुम्हें पुकारें ये मैया के अँगना।

सोलह श्रृंगार संग स्वप्न सजाए,
बैठी हूँ पिया मैं आस लगाए।

आ भी जाओ न देर लगाओ,
अग्नि के समक्ष अपना बनाओ।

____________________
शशि शर्मा”खुशी”
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“दोस्ती”

दोस्त होता है मन का मीत

दोस्ती में मिलती सच्ची प्रीत

जब भी मिलें होती ढेरों बातें

दिल के सारे भेद खुल जाते

दोस्ती तो है जीवन संगीत

दोस्त होता है मन का मीत

जात-पात से दूर है दोस्ती

जीवन का इक नूर है दोस्ती

बिन दोस्त सब लगता सूना

लाख तकरार,पर प्यार दूना

दोस्ती है तो दुखों पे जीत

दोस्त होता है मन का मीत

निर्झर रस की धार दोस्ती

निस्वार्थ बेशर्त प्यार दोस्ती

छल कपट से कोसों दूर है

निश्छल नेह बौछार दोस्ती

दोस्ती तो है पावन प्रीत

दोस्त होता है मन का मीत

—–****—–

@ शशि शर्मा “खुशी”

“नारी का क्रोधित स्वर”

तुम नारी हो तुम्हे चुप रहना

बचपन से सिखाया जाता है

हर दुख-दर्द को चुपचाप सहना

जन्म-घुट्टी में पिलाया जाता है

नम्र बनो-ज्यादा न हँसो, बातें

न करो-बस काम करो

नियमों में बाँधा जाता है

खाने-पहनने, सोने-जागने

से जीवन साथी तक

सब कुछ थोपा जाता है

मैं नारी हूँ बस शांति चाहूँ

इसिलिये चुप रहती हूँ

गूंगी न समझना |

स्नेह बाँटती प्रेम चाहती

इसिलिये सब सहती हूँ

बेबस न समझना

रिश्तों को इक डोर में

पिरोये रखना चाहती हूँ

कमजोर न समझना

सबको दिल से चाहती हूँ

दोनों घरों को खुशी-खुशी

अपनाती हूँ, पराई न समझना

है मुझमें दुर्गा रूप समाया

कमजोर नही सशक्त हूँ मैं |

जिस दिन हो गई अति

चण्डी रूप धर जाऊँगी

अति क्रोध में बन काली

सब तहस-नहस कर जाऊँगी

बेवजह यूँ जुल्म न ढाओ

अब भी वक़्त है सम्भल जाओ

रौद्र रूप धरने को न उकसाओ

शांत समुद्र में भाटा न लाओ

माँ ज्वाला की चिंगारी हूँ

मैं सशक्त सबला नारी हूँ

@ शशि शर्मा “खुशी”

सहनशीलता का महामंत्र

जापान के सम्राट यामातो का एक मंत्री था- ओ-चो-सान। उसका परिवार सौहार्द के लिए बड़ा मशहूर था। हालांकि उसके परिवार में लगभग एक हजार सदस्य थे, पर उनके बीच एकता का अटूट संबंध था। उसके सभी सदस्य साथ-साथ रहते और साथ ही खाना खाते थे। इस परिवार के किस्से दूर दूर तक फैल गए। ओ-चो-सान के परिवार के सौहार्द की बात यामातो के कानों तक भी पहुंच गई। सच की जांच करने के लिए एक दिन सम्राट स्वयं अपने इस बुजुर्ग मंत्री के घर तक आ पहुंचे।

स्वागत, सत्कार और शिष्टाचार की साधारण रस्में समाप्त हो जाने के बाद यामातो ने पूछा, ‘ओ-चो, मैंने आपके परिवार की एकता और मिलनसारिता की ढेरों कहानियां सुनी हैं। क्या आप बताएंगे कि एक हजार से भी अधिक सदस्यों वाले आपके परिवार में यह सौहार्द और स्नेह संबंध आखिर किस तरह बना हुआ है।’ ओ-चो-सान वृद्धावस्था के कारण ज्यादा देर तक बात नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपने पौत्र को संकेत से कलम-दवात और कागज लाने के लिए कहा। जब वह ये चीजें ले आया तो उसने अपने कांपते हाथ से करीबन सौ शब्द लिखकर वह कागज सम्राट को दे दिया।

सम्राट यामातो अपनी उत्सुकता न दबा पाया। उसने फौरन उस कागज को पढ़ना चाहा। देखते ही वह चकित रह गया। दरअसल, उस कागज पर एक ही शब्द को सौ बार लिखा गया था। और वह शब्द था- सहनशीलता। सम्राट को अवाक देख ओ-चो-सान ने कांपती हुई आवाज में कहा, ‘मेरे परिवार के सौहार्द का रहस्य बस इसी एक शब्द में निहित है। सहनशीलता का यह महामंत्र ही हमारे बीच एकता का धागा अब तक पिरोए हुए है। इस महामंत्र को जितनी बार दुहराया जाए, कम है।’