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गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर विशेष

|| ओम गणपतये नमः ||

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभः |

निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्व कार्येशु सर्वदा ||

भारतीय संस्कृति आध्यात्मवादी है, तभी तो उसका स्त्रोत कभी सूख नही पाता है | वह निरंतर अलख जगाकर विपरीत परिस्थितियों को भी आनंद और उल्लास से जोडकर  मानव जीवन में नवचेतना का संचार करती रहती है | त्यौहार, पर्व व उल्लास हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है, जिसमें जनमानस घोर विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन यापन करते हुये पर्वों के उल्लास, उमंग मे रमकर खुशी का मार्ग तलाश ही लेते हैं | मंगलकर्ता, विघ्नविनाशक गणेश जी के जन्मोत्सव की धूम चारों ओर मची है | मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन गणेश जी का आविर्भाव हुआ था, इसिलिये इस तिथि को गणेश चतुर्थी कहा जाता है | इस दिन गणेश जी की पुजा करते हैं व उत्सव मनातेहैं | कभी महाराष्ट्र में सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट और पेशवा आदि राजाओं द्वारा चलाई गई गणेशोत्सव की प्रथा आज महाराष्ट्र तक ही सीमित न होकर देश के कोने कोने में ही नही अपितु कई दुसरे राष्ट्रों में भी मनाया जाने वाला पर्व बन बैठा है

गणेशोत्सव की धूम सावर्जनिक स्थलों में विधुत साज-सज्जा के साथ सजाई गई गणेश जी की प्रतिमाओं के विराजमान होने से तो है ही साथ ही साथ घर-घर में विभिन्न सुंदर आकार-प्रकार की प्रतिमाओं के विराजने से और भी बढ जाती है |

बुद्धि के देवता प्रथम पुज्य गणेश जी :

प्रथम धरे जो ध्यान तुम्हारे |

तिनके पूरन कारज सारे ||

अर्थात जो व्यक्ति बुद्धि के देवता श्री गणेश जी का सर्वप्रथम ध्यान करता है, उसके सभी कार्य पूर्ण होते हैं | गणेश जी को प्रथम पुज्य देव कहा गया है इसका भावार्थ सीधा सा यह है कि जो व्यक्ति अपने कार्य को पूर्ण करना चाहता है उसे सर्वप्रथम अपनी बुद्धि को परखना होगा उस पर विश्वाश करना होगा और उसके प्रयोग मे सफलता हासिल करनी होगी | गणेश जी को मंगलकर्ता और विघ्नविनाशक भी कहा जाता है | यह भी इस बात की और संकेत करता है कि बुद्धि के सद्प्रयोग से ही सारी बाधाएं दूर हो जातीहैं और अच्छे दिनों की शुरूआत हो जाती है | यह तो हम जानते ही हैं कि मनुष्य के लिये बुद्धि कितनी आवश्यक है | लेकिन बुद्धि का उपयोग किस तरह से किया जाये ये अत्यंत ही महत्वपूर्ण है | जहाँ सद्धबुद्धि हमें नेक कार्यों की ओर प्रेरित करती है वहीं दुर्बुद्धि हमें गलत कामों की ओर प्रवृत करती है | गलत काम चाहे कितनी भी होशियारी से किये गये हों, लेकिन इनका परिणाम सदैव कष्टकारी ही होता है | गणेश पूजा का निहितार्थ यही है कि हम बुद्धि को तो सर्वोपरि मानें, लेकिन हमारे कार्यों और व्यवहार में सद्बुद्धि की छाप हो |

गणपति का प्रेरक स्वरूप :

बुद्धि के देवता श्री गणेश जी का स्वरूप हमारी प्रेरणा का स्त्रोत भी हैं | उनका बडा मस्तिष्क विशाल बुद्धि का परिचायक है जो बडी और उपयोगी बातें सोचने को प्रेरित करता है | उनकी छोटी-छोटी आंखें  हमें अपने कार्यों को सुक्ष्म और ध्यानपूर्वक करने की प्रेरणा देते हैं | उनके कान और नाक (सूंड) विशाल है जबकि मुंह उसकी तुलना में बहुत छोटा है जो ये दर्शाता है कि व्यक्ति को सभी की बातें सुननी चाहिये लेकिन वाणी का प्रयोग कम से कम करना चाहिये एवम संकट को दूर से ही सूंघ लेना चाहिये | उन्होने मस्तक पर चंद्रमा धारण किया हुआ है और चंद्र को शीतल माना गया है | जो इस बात के लिये प्रेरित करता है कि बुद्धि तभी सही ढंग से कार्य करती है जब उसके पास शीतलता होगी | जो कार्य ठंडे दिमाग से किये जाते हैं उनकी गुणवत्ता अधिक होती है | साथ ही जब भी जीवन में संकट के क्षण आयें तब यदि हम ठंडे दिमाग से हल निकालें तो कठिनाइयों से पार पा सकने योग्य मार्ग निकाल सकते हैं | गणेश जी के मुख पर ना तो हर्ष का अतिरेक है, न ही दुख की छाया | यह इस बात का संकेत है कि बुद्धिमान व्यक्ति सुख में न तो अधिक हर्षित होता है और न ही दुख में अधिक दुखी |

आइये, आज गणपति जी के जन्मदिवस पर उनको नमन करें और खुद से वादा करें कि जब भी कोई संकट आयेगा तो ठंडे दिमाग से उसका हल खोजेंगे | ज्यादा से ज्यादा व ध्यानपूर्वक ही सुनेंगे | कम से कम, मधुर एवम सारगर्भित ही बोलेंगे | सुख में अत्याधिक हर्षित नही होंगे और न ही दुख में अत्याधिक दुखी | सदैव अपनी बुद्धि को सकारात्मक कार्यों में ही लगायेंगे | यही होगा सही मायने में सार्थक पर्व | जिससे जनमानस में सुख व शांति का आविर्भाव होगा | तभी सार्थक होगा गणपति जी का जन्मोत्सव | तभी सही मायने में आज के पर्व का प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा | 

आप सभी को श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें |

श्री गजानंद जी महाराज आपके घर संसार व जीवन में सदैव आनंद मंगल एवम रिद्धि सिद्धि बनाये रखे |