पैसा

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इंसान ही इक ऐसा इकलौता जीव,
जो धरा पर रहने के दाम चुकाता है |
धरती माँ तो सब मुफ्त में लुटाती,
वो फिर उसकी कीमत है लगाता |
लगा कीमत खुद को विद्वान बताता,
कीमत अदा करने को पैसे कमाता |
पैसों से जमीन जायदाद जुटाता,
खाने पहनने को सामान ले आता |
फिर इक दिन इसी पैसे की खातिर,
भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता |
पैसा इंसान जरुरत के लिये बनाता,
वही इक दिन उस पर हावी हो जाता |
जो इक दिन सेवक था इंसान का,
वही इक दिन मालिक बन जाता |
पैसा इक दिन है सर चढकर बोलता,
हर रिश्ता तब इंसां पैसे से तौलता |
कुछ तो सोचो और बुद्धि लगाओ,
पैसे के ना तुम गुलाम बन जाओ |
जरुरत जितना तुम पैसा कमाओ,
इसके पीछे न स्वास्थ्य व रिश्ते गंवाओ |
@ शशि शर्मा “खुशी”
13/01/16
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